“मशहूर ना कर” "Mashahoor Na kar"
करने लगे हो शायरी, सरेआम अब तो,
चर्चा ईश्क का इतना, मशहूर ना कर ।
तुझे होश ही नहीं, दिन है या रात,
नशे में खुद को उसके इतना, चूर ना कर।
अकेला पाते है खुद को, वो अक्सर भीड़ में,
इस कदर तन्हा उसको, भरपूर ना कर।
कहां रहता है, किससे मिलता है, जरा गौर करो,
खुद से उसे इतना भी, दूर ना कर ।
वो तेरी कसम झूठ ही खाने लगे हैं,
चाहत में उसको इतना, मजबूर ना कर ।
वो छोड़ नहीं सकता, कहते फिरते हो सबसे,
ईश्क पर अपने ईतना भी, गुरूर ना कर।
किसी दिन मांग लेगा तुझसे, आज़ादी अपनी वो,
हर ख्वाहिश उसकी तू, मंजूर ना कर।
*हेम_राज*
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