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“कोई.. ?” (Koi..?)

  उसने मन में ही आवाज दी मुझे , भला ऐसे भी कभी किसी को , पुकारता है कोई.. ?   वो फूंक फूंक कर रखते है , हर जगह क़दम अपने , इतना भी कभी खुद को , संभालता है कोई.. ?   मैंने उसके लिए खुद को , ऐसे लगाया दाव पर , जैसे आसमान में , सिक्का उछालता है कोई.. ?   अब तो अपने घर भी, कुछ ऐसे जाना होता है , जैसे सराय में , रात गुजारता है कोई .. ?   धीरे-धीरे चढ़ता है , फिर उतारता है उसका नशा , जैसे अपने कीमती , जेवर उतारता है कोई.. ?   हर काम मुझसे पूछ कर करती है , इतना भी किसी को अपना , मानता है कोई.. ?   बिन बोले समझ जाती है , मेरे दिल में क्या है , हाँ, मुझसे भी ज्यादा मुझको , जानता है कोई.. ?   * हेम _ राज*  

सुनो, तुमसे कुछ कहना है... (Suno, Tumse kuchh kahna hai...)

  सुनो... तुमसे कुछ कहना है... कैसे करूं तारीफ तेरी , मुझे शर्म सी आती है , जचता है हर रंग तुझ पर , जो भी तूने आज तलक पहना है , सुनो... तुमसे कुछ कहना है ...   हां , तू ही है जिंदगी मेरी , तू मेरा , सबसे अनमोल गहना है , सुनो... तुमसे कुछ कहना है ...   जी करता है , कहीं दूर निकल जाऊं तेरे संग , तुझ संग मुझे पानी सा बहाना है , सुनो... तुमसे कुछ कहना है ...   मेरी सारी खुशियां मैं, दे दूं तुझे , तेरा हर एक गम , मुझे सहना है , सुनो... तुमसे कुछ कहना है ...   क्या जरूरत है मुझे , घर और बंगले की , ता उम्र मुझे , तेरे दिल में जो रहना है , सुनो... तुमसे कुछ कहना है ...     * हेम _ राज*