“कोई.. ?” (Koi..?)

 

उसने मन में ही आवाज दी मुझे,

भला ऐसे भी कभी किसी को, पुकारता है कोई..?

 

वो फूंक फूंक कर रखते है, हर जगह क़दम अपने,

इतना भी कभी खुद को, संभालता है कोई..?

 

मैंने उसके लिए खुद को, ऐसे लगाया दाव पर,

जैसे आसमान में, सिक्का उछालता है कोई..?

 

अब तो अपने घर भी, कुछ ऐसे जाना होता है,

जैसे सराय में, रात गुजारता है कोई..?

 

धीरे-धीरे चढ़ता है, फिर उतारता है उसका नशा,

जैसे अपने कीमती, जेवर उतारता है कोई..?

 

हर काम मुझसे पूछ कर करती है,

इतना भी किसी को अपना, मानता है कोई..?

 

बिन बोले समझ जाती है, मेरे दिल में क्या है,

हाँ, मुझसे भी ज्यादा मुझको, जानता है कोई..?


 

*हेम_राज*

 

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